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योग एवं सेहत

भक्तियोग

By HKSNEWS
July 2, 2026

यह योग भावनाप्रधान और प्रेमी प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए उपयोगी है। वह ईश्वर से प्रेम करना चाहता है और सभी तरह के क्रिया-अनुष्ठान, पुष्प, गंध द्रव्य, सुन्दर मन्दिर और मूर्ति आदि का आश्रय लेता और उपयोग करता है। प्रेम एक आधारभूत एवं सार्वभौम संवेग है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु से डरता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसे अपने जीवन से प्रेम है। यदि कोई व्यक्ति अधिक स्वार्थी है तो इसका तात्पर्य यह है कि उसे स्वार्थ से प्रेम है। किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी या पुत्र आदि से विशेष प्रेम हो सकता है। इस प्रकार के प्रेम से भय, घृणा अथवा शोक उत्पन्न होता है।
यदि यही प्रेम परमात्मा से हो जाये तो वह मुक्तिदाता बन जाता है। ज्यों-ज्यों ईश्वर लगाव बढ़ता है, नश्वर सांसारिक वस्तुओं से लगाव कम होने लगता है। जब तक मनुष्य स्वार्थ युक्त उद्देश्य लेकर ईश्वर का ध्यान करता है। तब तक वह भक्तियोग की परिधि में नहीं आता। पराभक्ति ही भक्तियोग के अन्तर्गत आती है। जिसमें मुक्ति को छोड़कर अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। भक्तियोग शिक्षा देता है कि ईश्वर से, शुभ से प्रेम इसलिए करना चाहिए कि ऐसा करना अच्छी बात है, न कि स्वर्ग पाने के लिए अथवा सन्तति, सम्पत्ति या अन्य किसी कामना की पूर्ति के लिए। वह यह सिखाता है कि प्रेम का सबसे बढ़कर पुरस्कार प्रेम ही है। और स्वयं ईश्वर प्रेम स्वरूप है।
‘हे ईश्वर अज्ञानी जनो की जैसी गाढ़ी प्रीति इन्द्रियों के भोग के नाशवान् पदार्थाें पर रहती है, उसी प्रकार की प्रीति मेरी मुझमें हो और तेरा स्मरण करते हुए मेरे हृदय से कभी दूर न होते।’ भक्तियोग सभी प्रकार के संबोधनों द्वारा ईश्वर को अपने हृदय का भक्तिअध्र्य प्रदान करना सिखाता है। जैसे-सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी आदि। सबसे बढ़कर वाक्यांश जो ईश्वर का वर्णन कर सकता है, सबसे बढ़कर कल्पना जिसे मनुष्य का मन ईश्वर के बारे में ग्रहण कर सकता है। वह यह है कि ‘ईश्वर प्रेम स्वरूप है।’ जहां कहीं प्रेम है वह परमेश्वर ही है। जब पति पत्नी का चुम्बन करता है, तो वहां उस चुम्बन में ईश्वर है। जब माता बच्चे को दूध पिलाती है तो इस वात्सल्य में वह ईश्वर ही है। जब दो मित्र हाथ मिलाते हैं, तब वहां वह परमात्मा ही प्रेममय ईश्वर के रूप में विधमान है। मानव जाति की सहायता करने में भी ईश्वर के प्रति प्रेम प्रकट होता है। यही भक्तियोग की शिक्षा है।
भक्तियोग भी आत्मसंयम, अहिंसा, ईमानदारी, निश्छलता आदि गुणों की अपेक्षा भक्त से करता है क्यांेकि चित्त की निर्मलता के बिना निःस्वार्थ प्रेम संभव ही नहीं है। प्रारम्भिक भक्ति के लिए ईश्वर के किसी स्वरूप की कल्पित प्रतिमा या मूर्ति ;जैसे दुर्गा की मूर्ति, शिव की मूर्ति, राम की मूर्ति, कृष्ण की मूर्ति, गणेश की मूर्ति आदिद्ध को श्र(ा आधार बनाया जाता है।

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