जख्मी राही
एक उम्र के बाद
किसी से बंधने का
मोह नहीं रह जाता
खुद को आजाद
करने का विद्रोह
जरूर आ जाता है
सारी उम्र निकल जाती है
सबको खुशियां देने में
खुद को भूल कर उनके
लिए करने में
कितना त्याग किया
कोई नहीं देखता
कितनी रातें आंसुओं से
तकिया भीगा किसी को
महसूस नहीं होता
कितनी बार दर्द में कराहे
फिर भी चलते रहे बिना रुके
चलते चलते रास्ता
खत्म हो जाता है
लेकिन मंजिल नहीं मिल पाती
जिंदगी जैसे एक
भुलभुलैया हो जाती है
और मन भागने लगता है
सब छोड़ कर सब तोड़ कर
फिर शुरू हो जाती है
एक छोटी सी कोशिश
आज़ादी की
नन्हे नन्हे पैरो से
आगे बढ़ने का प्रयास
जारी रहता है तब तक
जब तक आपकी गति
धीमी से तीव्र नहीं हो जाती
लगाव , प्यार , समर्पण
जैसे शब्द धुंधले हो जाते है
और सबसे ऊपर आता है
आपका आत्मसम्मान
उस एक पल जब
आप सब छोड़ कर
आगे बढ़ते है तब
ले पाते है एक सांस
सुकून की
एक सांस विश्वास की
और एक सांस खुशी की





