लय योग
लय योग
ब्रह्माण्ड के मध्य स्थित है ब्रह्मलोक। उसी तरह हमारे मस्तिष्क के मध्य में स्थित है ब्रह्मरंध। अपना संपूर्ण ध्यान ब्रह्मरंध पर केन्द्रित करके ब्रह्म;ईश्वरद्ध में लीन हो जाना ही लय योग कहलाता है।
लययोग के 9 अंग माने जाते हैं जो इस प्रकार से हैं-यम, नियम, स्थूल क्रिया, सूक्ष्म क्रिया, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, लयक्रिया और समाधि। इसमे स्थूल क्रिया का मंत्र क्रिया से, सूक्ष्म क्रिया का स्वरोदय क्रिया से, प्रत्याहार का नादानुसंधान क्रिया से तथा धारणा का षट्चक्र भेदन क्रिया से सम्बन्ध रहता है। हालांकि लय योग एक विस्तृत विषय है लेकिन सामान्यजन यदि सिर्फ ब्रह्मरंध पर ही ध्यान देते रहें तो लय सध जाता है। क्योंकि यही शक्ति का केन्द्र है।
लय योग का उद्देश्य
लय योग का उद्देश्य है कि मस्तिष्क शांत रहकर ब्रह्मलोक जैसा प्रकाशमान हो तथा मन निर्मल क्षीर सागर की तरह बनें। इसके लिए मस्तिष्क के ब्रह्मरंध पर ध्यान लगाकर चक्र और कुंडलिनी जागरण किया जाता है।
लय योग की सामान्य विधि
शांत स्थान पर ध्यानमुद्रा में बैठकर आंखें बंद कर ध्यान को मस्तिष्क के मध्य लगायें। मस्तिष्क के मध्य नजर आ रहे अंधेरे को देखते रहें और इसी में आनन्द लें तथा सांसों के आवागमन को महसूस करें। पांच से दस मिनट तक ऐसा करें।
लय योग का लाभ
उक्त ध्यान को निरंतर करते रहने से चित्त की चंचलता शांत होती है। ब्रह्मरंध;भ्रकूटीद्ध पर निरंतर ध्यान देने से व्यक्ति ब्रह्माण्ड की शक्ति से जुड़कर स्वयं को सकारात्मक उळर्जा का स्रोत बना लेता है। ईश्वर से जुड़ने का यही एकमात्र साधन है। इससे मस्तिष्क निरोगी, शक्तिशाली तथा निश्चित बनता है। सभी तरह की चिंता, थकान और तनाव से व्यक्ति दूर होता है।
