सूक्ष्म व्यायाम
हम तमाम दुनियाभर का ज्ञान हासिल करते हैं। शरीर रचना और शरीर रचना क्रिया विज्ञान के बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं होती।
हमारे शरीर में कौन-कौन से अंग होते हैं और वह कैसे कार्य करते हैं। यानि मानव शरीर और शरीर क्रिया विज्ञान के बारे में जानकारी रखना, भारत की नदियों और पहाड़ों के नाम याद करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मानव शरीर में कौन-कौन से अंग कहां स्थित हैं और वह कैसे काम करते हैं। जानकर हम अपने शरीर के बारे में और उसमें होने वाले रोगों या विकारों के बारे में ज्यादा जागरूक होते हैं। पहला सुख निरोगी काया को माना जाता है और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य व शरीर के लिए मानव शरीर का ज्ञान होना आवश्यक है। योगाभ्यास व योग क्रियाओं के प्रभाव को जानने-समझने के लिए योग में प्रवेश करने से पहले शरीर और शरीर रचना क्रिया विज्ञान को जानना आवश्यक है।
कोशिका
सम्पूर्ण सृष्टि जैविक ;स्पअपदहद्ध व अजैविक ;छवद स्पअपदहद्ध पदार्थों से बनी है। सभी जीव धारियों के शरीर की रचना असंख्य ;झ50 जतपसपंदद्ध छोटी छोटी इकाईयों से मिलकर बनी है जिन्हें कोशिका ;ब्मससद्ध कहते हैं। कोशिका का अर्थ है छोटी कोठरी। कोशिकाएं मधुमक्खी के छत्ते में असंख्य कोठरियां सी होती है। जैसे मकान व भवन ईंटों;ठतपबोद्ध से बना होता है, उसी तरह सभी जीव जन्तु कोशिकाओं ;ब्मससेद्ध से बने होते हैं। कुछ जीव एक कोशिका के बने होते हैं, जिन्हें एक कोशिकीय ;न्दपबमससनसंतद्ध कहते हैं और अधिकांश जीवों की रचना असंख्य कोशिकाओं से होती है जिन्हें बहुकोशिकीय ;डनसजपबमससनसतद्ध कहते हैं।
कोशिकाएं विभिन्न प्रकार की एवं सूक्ष्म होती है। सामान्यतः कोशिकाओं की लम्बाई 10 नउ से 100 नउ तक होती है। इन्हें नग्न आंखों से नहीं देखा जा सकता। इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी ;उपबतवेबवचमद्ध द्वारा ही देखा जा सकता है। परन्तु कुछ कोशिकाएं बड़े आकार की भी होती है। जैसे अण्डा ;म्हहद्ध व तन्त्रिका कोशिकाएं ;छमतअम ब्मससेद्ध आदि।
कोशिका की संरचना
कोशिका में पाये जाने वाले सजीव कोलायडी पदार्थ को जीवद्रव्य ;चतवजवचसंेउद्ध कहते हैं। जीवद्रव्य ;चतवजवचसंेउद्ध ही जीवन का भौतिक आधार है और इसके द्वारा ही जीवित प्राणी ;जीवद्ध अपनी सभी जैविक क्रियाएं जैसे श्वसन, गति, पोषण, आत्मीकरण, उत्सर्जन व जीव की उत्पत्ति आदि क्रियाएं करता है। जीवद्रव्य ;चतवजवचसंेउद्ध के नष्ट होने पर जीव की मृत्यु हो जाती है।
इलेक्ट्राॅनिक सूक्ष्मदर्शी ;म्समबजतवदपब डपबतवेबवचमद्ध से देखने पर कोशिका में बाहर की परत ;संलमतद्ध के रूप में कोशिका झिल्ली ;ब्मसस उमउइतंदम पद ंदपउंसे ंदक पद चसंदजे बमससद्ध होती है तथा अन्दर कोशिका द्रव्य ;ब्लजवचसंेउद्ध व केन्द्रक ;छनबसमनेद्ध होता है। केन्द्रक के अन्दर केन्द्रकद्रव्य ;छनबसमवचसंेउद्ध को मिलाकर संयुक्त रूप से जीवद्रव्य ;च्तवजवचसंेउद्ध कहते हैं। कोशिका के कोशिका द्रव्य ;बलजवचसंेउद्ध में कई महत्वपूर्ण चीजें ;व्तहंदमससमेद्ध पायी जाती हैं, जैसे म्दकवचसंेउपब तमजपबनसनउ, हवसहपइवकपमेए डपजवबीवदकतपं ;चवूमत ीवनेम व िबमससद्ध त्पइवेवउमे मजबण् जो ;बमससद्ध में विभिन्न ;डमजंइवसपबद्ध कार्य करते हैं।
केन्द्रक ;छनबसमनेद्ध कोशिका के मध्य भाग में ;।दपउंस बमससेद्ध अथवा किनारे की ओर ;पद चसंदजेद्ध गोल गहरे, रंग की रचना होती है। यह सभी कोशिकाओं में मिलता है। इसके अन्दर केन्द्रक द्रव्य ;छनबसमवचसंेउद्ध होता है, जो एक प्रकार का क्रोमेटिन ;ब्तवउंजपद.छनबसमवचतवजमपदद्ध प्रोटीन है। इसी में क्छ। ;क्मवगलतपइवदनबसमपब ।बपक -त्छ।;त्पइवदनबसमपब ।बपकद्ध आनुवांशिक ;ळमदमजपब डंजमतपंसद्ध पदार्थ पाये जाते हैं।
इन्हीं से कोशिका विभाजन के समय धागे के रुप में गुणसूत्र ;ब्ीतवउवेवउमेद्ध बनते हैं। यहीं पर छोटे-छोटे दाने ;ठमंकममकद्ध के रुप में ळमदमे स्थित रहते हैं। जीन्स ;ळमदमेद्ध के द्वारा ही माता-पिता के गुण ;भ्मतमकपजवतल ब्ींतंबजमतेद्ध सन्तान में पहुंचते हैं। केन्द्रक ;छनबसमनेद्ध कोशिका का, या यों कहें जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, कोशिका मे होने वाली सभी जीवन क्रियाओं को संचालित एवं नियंत्रित करता है। यही कोशिका का या जीवन का कंट्रोल रुम है।
कोशिका विभाजन
कोशिका के केन्द्रक ;छनबसमनेए क्छ।ए त्छ। मजबद्ध में ही विभाजन ;क्पअपेपवदद्ध की क्षमता है। इसमें 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8 आदि कोशिकाएं बनती हैं और इस प्रकार यह विशाल जीव, फिर विशाल जगत बनता है। यह भगवान प्रदत्त विश्व की सबसे विलक्षण प्रक्रिया है। सबसे पहले केन्द्रक ;छनबसमनेद्ध का एक से दो में विभाजन होता है, जिसे डपजवेपे कहते हैं, फिर तत्पश्चात् कोशिका द्रव्य व उसके अवयवों का दीर्घसूत्री विभाजन ;डपजवेपेद्ध होता है जनन अंगों में अर्धसूत्री ;डपमवेपेद्ध विभाजन होता है। इस प्रकार कोशिका विभाजन व गुणन ;ब्मसस क्पअपेपवदए डनसजपचसपबंजपवदद्ध के द्वारा शरीर अपना विकास करता है। शरीर अपनी टूट-फूट की मरम्मत करता है। जीव अपने पैतृक गुणों को प्राप्त करता है। विभिन्न प्रकार की कोशिकाएं ;टंतपवने जलचम व िबमससेद्ध विभिन्न प्रकार के कार्य आकृति व आकार के आधार पर कोशिकाएं कई प्रकार की होती हैं।
उपकला कोशिकाएं ;म्चपजीमसपंस बमससेद्ध-ये कोशिकाएं शरीर व अंगों का आवरण ;ब्वअमतद्ध बनाती हैं। अतः शरीर के चोट व जख्म ;प्दरनतलद्ध आदि से बचाती हैं।
तंत्रिका कोशिकाएं ;छमतअम बमससेद्ध-पूरे शरीर का तंत्रिका तंत्र ;छमतअवने ेलेजमउद्ध का निर्माण इन्हीं कोशिकाओं से होता है। ये कोशिकाएं पूरे शरीर में फैली होती हैं। इनका कार्य शरीर से संवेदनाएं ग्रहण करके मस्तिष्क व मेरूरज्जु, सुषुम्ना ;ैचपदंस बवतकद्ध तक पहुंचाना तथा सुषुम्ना व मस्तिष्क द्वारा दिये गये आदेशों ;प्रेरणाद्ध को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाना है।
अस्थि कोशिकाएं ;ठवदम बमससेद्ध-ये शरीर की हड्डियों का निर्माण करती हैं। जिससे हमारा कंकाल तंत्र ;ेामजमजंस ेलेजमउद्ध बनता है।
पेशी कोशिकाएं ;डनेबनसंत बमससेद्ध-ये लम्बी व पतली होती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं।
एच्छिक ;टवसनदजंतल उनेबसमेद्ध- जो मुख्यतः हमारे शरीर पर होती हैं और हमारे नियन्त्रण में होती हैं। जैसे -हाथ व पैर आदि की पेशी। कुछ पेशी स्वःचालित ;प्दअवसनदजंतलद्ध होती हैं जैसे शरीर के अन्दर की आहारनाल ;।सपउमदजंतल बंदंसद्ध व श्वसन आदि की पेशियां। ये हमारे नियन्त्रण में नहीं होती और अपने आप कार्य करती रहती हैं। तीसरे, हृदय की पेशियां ;ब्ंतकपंब डनेबसमेद्ध जिनसे हृदय का निर्माण होता है, और जीवनपर्यन्त कार्य करती हैं।
रूधिर ;रक्तद्ध कोशिकाएं ;ठसववक ब्मससेद्ध
रक्त भी कोशिकाएं व तरल पदार्थ ;ैमतनउद्ध का बना होता है। रक्त में मुख्यतः दो प्रकार की कोशिकाएं, श्वेत रक्त कोशिकाएं ;ॅीपजम इसववक बमससे वत ॅठब्द्ध व लाल रक्त कोशिकाएं ;त्मक इसववक बमससे वत त्ठब्द्ध होती है। लाल कोशिकाएं गोल तथा तश्तरी के समान उभरी हुई हैं। इनका कार्य शरीर में पोषक पदार्थ, आॅक्सीजन पहुंचाना है। श्वेत कोशिकाएं ;ॅठब्द्ध थोड़ा बड़ी व अनियमित आकार की होती है। इनका कार्य शरीर में सुरक्षा प्रदान करना है।
संयोजी कोशिकाएं ;ब्वददमबजपवअम ब्मससेद्ध शरीर को दो भागों में जोड़ने वाली कोशिकाओं को संयोजी कोशिकाएं कहते हैं। इनका कोई निश्चित आकार नहीं होता और रिक्त स्थान अधिक होता है।
उळतक ;त्पेेनमद्ध
कोशिकाओं के ऐसे समूह जो कार्य उत्पत्ति तथा रचना में समान हों उळतक ;त्पेेनमद्ध कहलाते हैं। इस प्रकार विभिन्न प्रकार और आकार की कोशिकाएं भिन्न-भिन्न प्रकार के उळतक ;ज्पेेनमेद्ध बनाती हैं जो अपने अनुसार कार्य करते हैं। उळतक ही मिलकर अंग बनाते हैं। संरचना व कार्य के आधार पर उळतक कई प्रकार के होते हैं। जैसे-उपकला ;म्चपजीमसपंस ज्पेेनमद्ध -त्वचा व अन्य अंगों की आवरण ;ब्वअमतपदहद्ध
संयोजी उळतक ;ब्वददमबजपअम जपेेनमरू ठवदमेए ठसववकए वत सलउचीद्ध
पेशीय उळतक ;डनेबनसंत जपेेनमद्ध. शरीर व हृदय की पेशियां
तंत्रिका उळतक ;छमतअवने जपेेनमद्ध. मस्तिष्क, मेरूरज्जू ;ैचपदंस ब्वतकद्ध व तंत्रिकाएं ;छमतअमेद्ध।
शरीर के अंग ;व्तहंदे ैलेजमउद्ध
कोशिका जीवधारियों की रचना की एक इकाई ;न्दपजद्ध है। एक प्रकार अनेक कोशिकाएं मिलकर उळतक ;ज्पेेनमद्ध बनाती हैं। विभिन्न प्रकार के उळतक मिलकर अंगों का निर्माण करते हैं और विभिन्न अंग मिलकर तन्त्र ;ैलेजमउद्ध बनाते हैं।
प्रत्येक तंत्र ;ेलेजमउद्ध का कार्य भी भिन्न होता है, जैसे एक थ्ंबजवतल में विभिन्न विभाग होते हैं। विभिन्न तन्त्र मिलकर शरीर का निर्माण होता है। इनके ठीक, सुचारू रूप से कार्य करने पर अच्छा स्वास्थ्य निर्भर है और योगमय जीवन इसका आधार है।
शरीर के मुख्य तंत्र ;ेलेजमउद्ध जैसे-
1. तंत्रिका तंत्र ;छमतअवने ेलेजमउरू ठतंपदए ैचपदंस ब्वतक – छमतअमेद्ध
2. श्वसन तंत्र ;त्मेचपतंजवतल ेलेजमउरू सनदहए ज्तंबीमंए छवेमए क्पंचीतंहउ मजबण्द्ध
3. रक्त परिसंचरण तंत्र ;ठसववक ब्पतबनसंजवतल ेलेजमउरू भ्मंतजए ।तजपबसमेए टमपदेए ठसववक मजबण्द्ध
4. पाचन तंत्र ;क्पहमेजपअम ेलेजमउद्धः आहार नाल, पाचक ग्रन्थि, यकृत, पैन्क्रियाज, स्राव ग्रन्थियां आदि। ;।सपउमदजतल बंदंसए कपहमेजपअम हसंदकेए सपअमतए ळंससइसंककमतए च्ंदबतमंे ैंसपअमल हसंदकेद्ध
5. उत्सर्जी तंत्र ;म्गबतमजवतल ेलेजमउरू ापकदमलेए न्तमजमतेए न्तपदंतल इसंककमतए च्तवेजंजम मजबण्द्ध
6. अस्थि तन्त्र या कंकाल तंत्र ;ैामसमजंस ेलेजमउरू ठवदमे – श्रवपदजेद्ध
7. मांसपेशी तंत्र ;डनेबनसंत ेलेजमउद्धरू प्दअवसनदजवतलए टवसनदजवतल – उनेबसमे
8. प्रजनन तंत्र ;त्मचतवकनबजपअम ेलेजमउद्ध
9. अंतःस्रावी तंत्र ;म्दकवबतपदम ेलेजमउद्धरू भ्वतउवदमे मजबण्
कंकाल या अस्थि संस्थान ;ैामसमजंस ैलेजमउद्ध
कंकाल अस्थियों ;ठवदमेद्ध और उपास्थियों ;ब्मतजपसंहमद्ध का बना ढांचा है। कंकाल तंत्र शरीर का एक महत्वपूर्ण तंत्र है। हमारे शरीर में 206 हड्डियां होती हैं। इसी से शरीर को रूप व आकार मिलता है। इसी से शरीर गतिशील व क्रियाशील बनता है। इसके कुछ महत्वपूर्ण कार्य हैं-भीतरी अंगों की सुरक्षा- हड्डियां परस्पर मिलकर एक पिंजर बना लेती हैं। जिनके अन्दर अंग हृदय, फेफड़े व मस्तिष्क आदि सुरक्षित रहते हैं। श्वसन व श्रवण में सहयोग भी प्रदान करते हैं। ज्तंबीमंए त्पइेए कान की हड्डियां ;पदबनेए उंससमने ेजंचमेद्ध आदि।
पेशियांे को जुड़ने का स्थान देना रक्त कणों का निर्माण करना। अस्थि ;ठवदमेद्ध के अन्दर ही एक गुददेदार भाग होता है, जिसे ;ठवदम उंततवूद्ध कहते हैं। इसी में रक्त कणों ;त्ठब् – ॅठब्द्ध का निर्माण होता है।
मांसपेशी ;डनबनसंत ेलेजमउद्ध
हमारे शरीर में पेशी तंत्र का भी महत्व है जितना कंकाल तंत्र का। शरीर का कुल आधा भार पेशियों के ही कारण होता है। शरीर का रूप, सौन्दर्य, गति, आकार पेशियों से ही प्राप्त होता है। पेशियों के ही कारण शरीर विभिन्न जैविक क्रियाओं को करता है। हमारे शरीर में लगभग 600 पेशियां पायी जाती हैं। मांसपेशियों में संकुचन व विमोचन ;ब्वदजतंजपवद ंदक तमसंगंजपवदद्ध विशेष गुण होता है। इसी गुण के कारण ये और सिकुड़कर और छोटी हो जाती हैं और फिर फैलकर बड़ी हो जाती हैं। इसी गुण के कारण शरीर में गति होती है। चलना, फिरना, बोलना, पलक झपकना, सांस लेना, हृदय से रक्त को रक्त की नलियों द्वारा पूरे शरीर में परिभ्रमण कराना, शरीर के अंगों को आहार व पोषक पदार्थ पहुंचाना आदि कार्य मांसपेशियों से संभव है। आंतरिक रचना तथा कार्यों के आधार पर पेशियों के तीन प्रकार हैं-ऐच्छिक ;टवसनदजंतलद्ध, अनैच्छिक ;प्दअवसनदजंतलद्ध तथा हृदय ;ब्ंतकपंबद्ध मांसपेशियां। मांसपेशियों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, व्यायाम, शु( वायु सेवन तथा योगक्रियाएं तथा उचित विश्राम आवश्यक है।
रक्त परिसंचरण तंत्र ;ठसववक ब्पतबनसंजवतल ैलेजमउद्ध
रक्त परिसंचरण तंत्र उन सभी अंगों, हृदय व रक्त वाहिकाएं ;ठसववक टमेेसमेद्ध आदि का समूह है जिनके द्वारा रक्त शरीर के विभिन्न अंगों में पहुंचाया जाता है। इसका कार्य रक्त के माध्यम से आॅक्सीजन, हार्माेन व अन्य पौष्टिक तत्वों को शरीर के अंगों व कोशिकाओं ;बमससेद्ध में वितरित करना तथा कोशिकाओं ;बमससेद्ध से विजातीय ;ॅंेजमद्ध तत्वों जैसे-कार्बनडाइआॅक्साइड ;ब्व्2द्ध को श्वसनांगों ;स्नदहेद्ध और अमोनिया, यूरिया आदि को उत्सर्जन अंगों ;ज्ञपकदमलेद्ध से बाहर निकलना है।
इसके अन्तर्गत हृदय, रक्त वाहिनियां ;भ्मंतजए ठसववक टमेेमसे पण्म अमपदेए ंतजमतपमे ंदक बंचपससंतपमेद्ध आती हैं। हृदय शरीर में एक सशक्त पम्प के रूप में कार्य करता है। यह रक्त को धमनियांे ;।तजमतपमेद्ध में पम्प करता है। धमनियां ;।तजमतपमेद्ध पूरे शरीर में जाल के रूप में फैली होती हैं, जिससे रक्त शरीर के हर हिस्से व हर कोशिका ;ब्मससद्ध में पहुंचता है तथा पोषक पदार्थ व आॅक्सीजन की सप्लाई होती है। व्यर्थ पदार्थ ;ब्व2 व यूरिया आदिद्ध, जो अंगों द्वारा त्यागे जाते हैं उन्हें शिराओं ;टमपदेद्ध द्वारा हृदय में शु(िकरण के लिए ले जाती हैं। यह तन्त्र इन्हीं दो कार्यों ;1द्ध शु( रक्त शरीर के अंगों तक पहुंचाना, तथा ;2द्ध अशु( रक्त का शु(िकरण करना, को निरंतर नियमित व सन्तुलित गति से करता रहता है।
रक्त की संरचना ;ब्वदेजपजनमदजे व िठसववकद्ध
रक्त एक प्रकार की संयोजी उळतक चिपचिपा, गाढ़ा, हल्का नमकीन व हल्का पीला लाल रंग का तरल पदार्थ है जिसका शरीर में परिसंचरण ;ब्पतबनसंजपवदद्ध होता है। एक स्वस्थ शरीर में लगभग 5-6 लीटर रक्त हर समय दौरा करता रहता है। रक्त के दो भाग होते हैं। एक तरल अंश, प्लाज्मा ;च्संेउंद्ध, दूसरा ठोस, रक्त कणिकाएं ;त्ठब्द्ध, जो मुख्यतः अस्थिमज्जा ;ठवदम उंततवूद्ध में बनती हैं। ये कणिकाएं मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं। 1. लाल रक्त कणिकाएं;त्ठब्द्ध। 2. श्वेत रक्त कणिकाएं ;ॅठब्द्धए 3. रक्त पट्टिकाएं ;ठसववक च्संजमसमजेद्ध,
1. लाल रक्त कणिकाएं ;त्ठब्द्ध-तश्करी के आकार की गोल उभरी हुई सूचना हैं, जिनमें लाल रंग का हिमोग्लोबिन होता है। यही कोशिकाओं में आॅक्सीजन की सप्लाई करता है।
2. श्वेत रक्त कणिकाएं ;ॅठब्द्ध-शरीर में चोट, आघात तथा संक्रामक रोगों के विरू( सुरक्षा प्रदान करती हैं। एक प्रकार से शरीर में ये सैनिक का कार्य करती है।
3. रक्त पट्टिकाएं ;ठसववक च्संजमसमजेद्ध-इनका मुख्य कार्य रक्त जमने में सहायता करना है।
लसिका ;स्लउचीद्ध
हमारे शरीर की कोशिकाओं का पोषण रक्त से नहीं, वरन कोशिकाओं से छन-छन कर निकले हुए जीवद्रव्य के भाग से होता है, जिसे लसिका ;स्लउचीद्ध कहते हैं। यह लाल, बैगनी रंग का द्रव पदार्थ होता है जो उतकों में पाया जाता है। वास्तव में कोशिकाएं कभी भी रक्त के सम्पर्क में प्रत्यक्ष रूप में नहीं आतीं, वे लसिका के ही सम्पर्क में आती हैं और उसी से पोषक पदार्थ पाती हैं। लसिका में वे सभी पदार्थ घुले रहते हैं। जिनकी कोशिका को आवश्यकता होती है। लसिका ;स्लउचीद्ध एक प्रकार से माध्यम ;डमकपनउद्ध है जिसके द्वारा रक्त के पोषक पदार्थ व कोशिकाओं के निकले हुए विजातीय पदार्थ ;ब्व्2 मजबद्ध का आदान प्रदान होता है। यह भी परिसंचरण तंत्र ;ब्पतबनसंजवतल ेलेजमउद्ध का भाग है। इसमें लसिका वाहिनियां ;स्लउची कनबजेद्ध होती हैं, जो लसिका कोशिकाओं के जाल से मिलकर बनती हैं। लसिका नलियों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर अण्डाकार लघु पिंड होते हैं। जिन्हें लिम्फ नोडस ;स्लउची दवकमेद्ध कहते हैं। ये फिल्टर का कार्य करते हैं, जो लसिका में दूषित, व्यर्थ पदार्थों व जीवाणुओं को रोक लेते हैं। ये मुख्यतः बगल, गर्दन, फेफड़े, उदर व जांघ के जोड़ों आदि में होते हैं। कभी संक्रमण होने पर इनमें सूजन आ जाती हैं और दर्द भी होता है।
रक्त परिसंचरण के मुख्य अंग ;डंपद ळतहंदे व िठसववक ब्पतबनसंजपवदद्ध
1. हृदय ;भ्मंतजद्ध 2. धमनियां ;।तजमतपेमद्ध 3. शिरायें ;टमपदेद्ध 4. कोशिकाएं ;ब्ंचपससंतपमेद्ध
हृदय ;भ्मंतजद्ध
हृदय हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। यह गर्भ से लेकर जीवन पर्यन्त नियमित धड़कता रहता है। जब यह धड़कन रुक जाती है तो जीवन लीला समाप्त हो जाती है।
हृदय अत्यंत पुष्ट पेशियों ;डनेबसमेद्ध का बना हुआ गहरे लाल व बैंगनी रंग का मांसल शंकू ;ब्वदमद्ध के आकार का खोखला अंग है, जो देखने में मुठठी के समान लगता है। यह सीने ;जीवतंबपब बंअपजलद्ध में दोनों फेफड़ांे के बीच बायें तरफ स्थित होता है। इसका वनज लगभग 300 ग्राम होता है। यह एक मजबूत भित्ती ;ैमचजनउद्ध द्वारा दायें व बायें भाग में बंटा होता है। उळपर के चैम्बरों को ।जतपनउ या ।नतपबसम ;अलिन्दद्ध तथा नीचे के चैम्बरों को निलय तथा बांयी ओर बायां अलिन्द व निलय ;स्मजि ंजतपनउ ंदक समजि अमदजतपबसमद्ध होते हैं। दोनों ओर के अलिन्द व निलय ;।जतपनउ ंदक अमदजतपबसमद्ध एक दूसरे से कपाट ;टंसअमद्ध द्वारा अलग रहते हैं। दायें वाले वाल्ब को ज्तपबनचपक टंसअम तथा बायें तरफ के वाल्व को ;डपजतंस अंसअमद्ध कहते हैं। वाल्व में रक्त ;ठसववकद्ध ।जतपं से टमदजतपबसम में तो आता है, मगर वापस नहीं जा सकता। इस प्रकार ये वाल्व रक्त को एक ही दिशा में जाने देते हैं।
हृदय से सम्बन्धित रक्त वाहिनियां ;ठसववक टमेेमसेद्ध
शिराएं ;टमपदेद्ध-हृदय में रक्त लाने और हृदय से रक्त ले जाने का कार्य धमनियां ;।वतजंए ंतजतमपमेद्ध और कोशिकाएं ;ब्ंचपससंतपमेद्ध करती हैं।
बायें निलय ;स्मजि अमदजतपबसमद्ध से महाधमनी ;।वतजंद्ध निकलती है, यहां पर ।वतजपब अंसअम लगा होता है। रक्त ;।वतजपब टंसअमद्ध से ।वतजं में जाता है, मगर वापस नहीं लौटता। ।वतजं आगे बहुत शाखाओं में विभक्त ;ंतजमतपमेद्ध होती है, जिनके द्वारा पूरे शरीर में रक्त वितरित होता है।
हृदय धमनियां ;बवतवदंतल ।तजमतपमेद्ध
हृदय रक्त का भण्डार है, लेकिन फिर भी हृदय अपना पोषण स्वयं नहीं कर पाता है। हृदय को रक्त द्वारा आॅक्सीजन ब्वतवदंतल ंतजमतपमे से मिलती है। दो मुख्य ब्वतवदंतल ंतजमतपमे ंवतजपब तववज से निकलती हैं और कई शाखाओं में विभक्त होकर पूरे हृदय को रक्त आपूर्ति करती हैं।
पलमोनरी धमनी ;च्नसउवदंतल ।तजमतलद्ध-यह धमनी एक ऐसा अपवाद है जिसमें अशु( रक्त होता है, क्योंकि यह हृदय से निकलती है इसलिए इसे ।तजमतल कहते हैं। यह दाहिने निलय ;तपहीज अमदजतपबसमद्ध से निकलती है और शु(िकरण के लिए, शरीर से आया अशु( रक्त, अपनी दो शाखाओं द्वारा फेफड़ों में पहुंचाती है। इसमें भी पलमोनरी वाल्व लगा होता है, जो रक्त को वापस नहीं लाने देता है।
शिराओं;टमपदेद्ध-शिराएं धमनियां ;।तजमतपमेद्ध से पतली तथा ब्ंचपससंतमे से बड़ी, चैड़ी होती हैं। ये विभिन्न अंगों से अशु( रक्त को हृदय में वापस लाने का कार्य करती है। मुख्य टमपदेए प्दमितपवत टमदंबंअं;प्टब्द्ध व ैनचमतपवत टमदवबंअं ंदक च्नसवउवदंतल टमपद भी अपवाद है क्योंकि इसमें शु( रक्त होता है। यह चार शाखाओं फेफड़ों ;स्नदहेद्ध से शु( रक्त हृदय के ;स्मजि ।जतपनउद्ध में लाती हैं जहां से रक्त ;स्मजि अमदजतपबसमद्ध में को होकर ;।वतजंद्ध द्वारा पूरे शरीर में संचालित होता है।
कोशिकाएं ;ब्ंचपससंतपमेद्ध-धमनियां ;।तजमतपमेद्ध सिरा में ;टमपसेद्ध शाखाओं ;ठतंदबीमेद्ध और शाखाओं की भी शाखाएं जब आखिरी कोशिका या ज्पेेनम तक पोषण पहुंचाती हैं तो ब्ंचपससंतपमे कहलाती हैं। वहां पर ये काफी महीन, एक कोशिकाओं ;ंतजमतपवसमे – अमदनसमेद्ध होती हैं, यहीं पर कोशिका व ज्पेेनम स्लउची माध्यम में पोषण व आॅक्सीजन का आदान प्रदान करते हैं। ये ही ब्ंचपससंतल ज्पेेनम व ब्मसस से विजातीय पदार्थ ;ब्व्2 मजबद्ध लेकर, मिलकर शिराएं ;टमपदेद्ध बनाती हैं और हृदय त़क पहुंचाती हैं।
हृदय की क्रियविधि ;डमबींदपेउ व िभ्मंतजद्ध-हृदय एक प्रकार का मांसल पम्प है, जिसका कार्य फेफड़ों ;स्नदहेद्ध से प्राप्त शु( रक्त को महाधमनी ;।वतजंद्ध द्वारा पूरे शरीर में पहुंचाना, शरीर से टमपदे द्वारा अशु( रक्त को पलमोनरी धमनी ;।तजमतलद्ध द्वारा शु(िकरण के लिए फेफड़ों में पम्प करना है। इसके लिए हृदय में निरन्तर धड़कन ;भ्मंतज ठमंजेद्ध होती रहती है। इसमें दो अवस्थाएं हैं, संकुचन ;ैलेजवसपबद्ध तथा अनुशिथिलन ;क्पंेजवसपबद्ध। संकुचन ैलेजवसम व क्पंेजवसम मंे हृदय नियमित जीवन पर्यन्त, लयब( तरीके से ब्वदजतंबजपवद ंदक त्मसंगंजपवद ;म्गचंदेपवदद्ध होता रहता है। एक स्वस्थ मनुष्य का हृदय 60-90 बार प्रति मिनट धड़कता है।
इस प्रकार फेफडे़ ;स्नदहेद्ध से शु( रक्त-पलमोनरी वेन्स ;च्नसउवदंतल टमपदेद्ध द्वारा – स्मजि ।जतपनउ में आता है-टपं डपजतंस टंसअमए टंसअम ;।वतजंद्ध के द्वारा विभिन्न ।तजमतपमे के जरिए पूरे शरीर में प्रवाहित होता है।
इस प्रकार शरीर से अशु( रक्त शिराओं ;टमपदेए ैटब् – प्टब्द्ध द्वारा त्पहीज ।जतपनउ में आता है-फिर ज्तपबनेचपक टंसअम द्वारा -त्पहीज टमदजतपबसम में आता है। वहां फिर त्पहीज टमदजतपबसम के ब्वदजतंबजपवद से च्नसउवदंतल ंतजमतल द्वारा फेफड़ों में शु(िकरण के लिए आता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती है। इसमें व्यवधान आने पर हृदय आघात ;भ्मंतज ।जजतंबाद्ध होता है, और जीवन लीला समाप्त तक हो जाती है।
पाचन तंत्र ;क्प्ळम्ैज्प्टम् ैल्ैज्म्डद्ध
प्रमुख अंग-मुँह ;व्तंस बंअपजलद्ध, जीभ ;ज्वदहनमद्ध, दांत ;ज्ममजीद्ध, स्वाद ग्रन्थि ;ेंसपअंतल हसंदकद्ध, भोजन नली ;व्मेवचींहनेद्ध, अमाशय ;ैजवउंबीद्ध, छोटी आंत ;ैउंसस प्दजमेजपदमद्ध, पक्काशय ;क्नवकमदनउद्ध, क्षुद्रान्त ;ससमनउद्ध, बड़ी आंत ;स्ंतहम पदजमेजपदमद्ध, मलाशय ;त्मबजनउद्ध, गुदा द्वार ;।दनेद्ध, अग्नाशय ;च्ंदबतमंेद्ध, यकृत ;स्पअमतद्ध, पित्ताशय ;ळंसस इसंककमतद्ध
शरीर में शक्ति उत्पन्न करने, ताप को बनाये रखने, नष्ट कोशिकाओं के पुनः निर्माण एवं नई कोशिकाओं के निर्माण के लिए शरीर को आहार की आवश्यकता पड़ती है। हम जिस रूप में भोजन करते हैं, वह उसी रूप में शरीर के लिए उपयोगी नहीं होता है। भोजन के अधिक अवयव जटिल यौगिक रसायन के रूप में रहते हैं तथा जल में अघुलनशील होते हैं। ये उसी रूप में शरीर की कोशिकाओं के उपयोग में नहीं आते। परन्तु शरीर के अन्दर कुछ इस प्रकार की रासायनिक व यांत्रिक प्रक्रियाएं होती रहती हैं। जिनसे जटिल यौगिक सरल यौगिक पदार्थ एवंज ल में घुलनशील बन जाते हैं। अमाशय और क्षुद्रांत्रों में भोजन खंडित कर दिया जाता है। यह परिवर्तन एन्जाइम नामक रसायन के प्रभाव से होता है। एन्जाइम में विभिन्न प्रकार के पाचक रस रहते हैं, जो ये परिवर्तन क्रिया करते हैं।
पाचन क्रिया मुंह से प्रारम्भ होती है और उसका अन्त बड़ी आंत में होता है। यह क्रिया बड़ी नली के अन्तर्गत होती है। जो मुंह से लेकर गुदा द्वार तक फैली रहती है। यह नली अनैच्छिक पेशियों की बनी होती है, जिसे पोषण नाल कहते हैं। यह 10 मीटर लम्बी एक नलिका है। यह नली पूरी लम्बाई में एक ही तरह चैड़ी नहीं रहती तथा इसके कई अलग-अलग भाग होते हैं, जिनके कार्य भी अलग-अलग होते हैं। इसके अन्तर्गत मुंह, ग्रसनी, ग्रासनली, अमाशय, पक्वाशय, क्षुद्रांत, वृहदांत्र आदि प्रमुख हैं। पोषक नाल के प्रत्येक भाग में पाचक रसों को बनाने वाली ग्रंथियां दीवारों में लगी रहती हैं। जिनकी कोशिकाएं रस को बना कर नलिका में भेजती रहती है, जिससे भोजन सरल पदार्थों में बदल जाता है। और शरीर के विभिन्न भागों में अवशोषित होकर पहुंच जाता है। उपर्युक्त अंगों को सामूहिक रूप से पाचन तंत्र कहते हैं। इस तन्त्र में भोजन का पचना, पचे हुए पदार्थ का अवशोषित होना तथा अवशिष्ट पदार्थ मल द्वार से बाहर निकलना आदि होता है।
सर्वप्रथम मंुह में भोजन दांतों के माध्यम से चबता है तथा लार ;लार कार्बोहाइड्रेट को शर्करा में बदलती हैद्ध का मिलान होता है। फिर भोजन नली द्वारा जिसकी लम्बाई दस इंच के लगभग होती है वहां से भोजन अमाशय में आता है जहां चार से छः घंटे तक रहता है। इसमें अमाशायिक रस मिलता है तथा भोजन का लुगदी के रूप में परिवर्तन होता है। पक्वाशय में सभी प्रकार के पाचक रस भोजन में मिलते हैं। पित्त व क्लोम रस कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, शर्करा व वसा का पाचन करते हैं। यहीं से छोटी आंत शुरू होती है। यह कुण्डलीकार में उदर में रहती है। इसकी लम्बाई बाईस से चैबीस फुट होती है। जो भोजन रासायनिक क्रिया के बाद आंत में धकेला जाता है। धीरे-धीरे भोजन को अतंड़ियां अपनी सिकुडन व फैलाव क्रिया से आगे की ओर सरकाती रहती है औैर पचे भोजन में से पोषक तत्वों को अवशोषित करती रहती है। छोटी आंत के नीचे दांयी ओर बड़ी आंत से मिलती है। बचा हुआ अवशिष्ट पदार्थ इसमें धकेल दिया जाता है। बड़ी आंत पांच से छः फुट लम्बी होती है। यहां भी सिकुड़न व फैलाव की क्रिया द्वारा मल आगे सरकाया जाता है। यहां पर बचे हुए जल का अवशोषण होकर खून में मिल जाता है तथा अवशिष्ट पदार्थ मलाशय में आता है जहां गुदा द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।
यकृत ;स्पअमतद्ध
शरीर में यकृत एक बड़ा रासायनिक कारखाना है, क्योंकि यहीं अंतर्वर्ती चयापचय होकर भोजन का पोषक तत्व उळतकों के उपयोग योग्य बन जाता है। यकृत हमारे शरीर में दाहिने ;जिमनेद्ध भाग में उदर पटल के नीचे आया शरीर का प्रमुख तथा सबसे बड़ा अंग है। इसका भार लगभग 1.4 कि.ग्राम होता है। इसके नीचे ही बैंगन के आकार का पित्ताशय आया है। यकृत द्वारा निर्मित पित्त पित्ताशय में संग्रहित रहता है तथा आवश्यकता पड़ने पर पित्त नली द्वारा पक्वाशय में मिल जाता है।
प्रमुख कार्य
1. पित्त का स्राव,
2. यूरिया व यूरिक अम्ल का निर्माण
3. विष मारण क्रिया ;क्मजवगपबंजपदह ।बजपवदद्ध
4. ग्लायकोजिन बनना तथा संग्रह करना ;उळर्जा को संग्रहित करने का कार्यद्ध
5. रासायनिक पदार्थ हिपारिन का बनना
6. फाइब्रिनोजन का बनना
7. अनेक पदार्थों का संग्रहालय
8. रक्त के मृत लाल कणिकों को रक्त से अलग करना
9. शरीर के तापक्रम को बनाए रखना
10. रक्त क्षीणता को दूर करना।
पित्ताशय ;ळंसस.ठसंककमतद्ध
यकृत के नीचे बैंगन के आकार की एक थैली रहती है। जिसमें यकृत से निकला रस पित्त एकत्रित होता रहता है। जिसे पित्ताशय कहते हैं। भोजन करने के आधा घंटे के उपरांत पित्त ग्रहणी ;क्नवकमदनउद्ध में चला जाता है और पित्ताशय में संकुचन हो जाता है। इस तरह पित्त प्रवाह निरंतर नहीं रहता। भोजन करने के बाद ही वह ग्रहणी में जाता है।
अग्नाशय ;च्ंदबतमंेद्ध
अग्नाशय एक लम्बी तथा चपटी ग्रंथि है। यह उदर के उळपरी मध्य भाग से लेकर पिल्हा तक फैली रहती है। इसकी लम्बाई 15 से 20 सेमी., चैड़ाई लगभग 4 सेमी. तथा मोटाई 2.5 सेमी होती है। अग्नाशय एक बहुत ही शक्तिशाली पाचक रस पैदा करता है। जो भोजन को आंतों में तोड़ने का काम करता है व भोजन के सभी अवयवों को पचाने की शक्ति होती है।
अग्नाशयिक रस में चार प्रकार के रस ;म्द्रलउमेद्ध होते हैं। जो एक नली से होता हुआ ग्रहणी ;क्नवकमदनउद्ध तक आता है। इसमें एंजाइम और लवण होते हैं, जो प्रोटीन, स्टार्च, चीनी और चिकनाई को पचाने में सहायता करते हैं। जैसे ही खाना मुंह में आता है वैसे ही स्वाद नलिकाएं मस्तिष्क को संदेश भेजती हैं। जिसके द्वारा मस्तिष्क अग्नाशय को पाचक रस पैदा करने के लिए उत्तेजित कर देता है। इस पाचक रस में सोडियम बाइकार्बोनेट होता है, जो अम्ल को उदासीन करने का काम करता है। दूसरे दो में से एमाइलेप्सिन ;।उलसवचेपदद्ध नामक एंजाइम कार्बोहाइड्रेट पचाता है तथा स्टियाप्सिन ;ैजमंचेपदद्ध चिकनाई को पचाने का काम करता है। प्रोटीन पचाने वाले मुख्य एंजाइम को ट्रिप्सिन ;ज्तलचेपदद्ध कहते हैं।
पाचन क्रिया के अतिरिक्तयह अंग इन्सुलिन और ग्लूकैजन नामक हारमोन भी पैदा करता है। इंसुलिन एक ऐसा हारमोन है, जो रक्त में चीनी का स्तर बढ़ने पर उसे कम करता है। यह हारमोन यकृत में ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में बदल देता है। ये दोनों हारमोन एक साथ काम करते हुए शरीर की उळर्जा पूर्ति पर नियंत्रण करते हैं।
प्लीहा;ैचसममदद्ध
यह शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। लम्बाई में 5 इंच व चैड़ाई 3 इंच तथा वनज में 200 ग्राम का यह अमाशय के पीछे कुछ नीचे अवस्थित है। प्लीहा की आंतरिक रचना में स्पंजी उळतक रहते हैं। जिन्हें प्लीहिक मज्जा कहते हैं। स्पंजी रचना के कारण प्लीहा में बहुत अधिक रक्त समा सकता है। समस्त शरीर के रक्त का लगभग 1/4 भाग प्लीहा में समा जाता है। जो लाल रक्त कणिकाएं नष्ट हो जाती हैं। उनके टुकड़ों को ये रक्त संचरण में से निकाल लेते हैं। इन्हीं कार्यों के कारण प्लीहा को लाल रक्त कणों की कब्रगाह अथवा समाधि-स्थल कहते हैं। इस आगार के रक्त में लाल रक्त कणिकाएं अत्यधिक सांद्रण अवस्था में रहते हैं। आपात काल में तथा कार्यभार के बढ़ जाने पर प्लीहा संकुचित होकर सामान्य रक्त-परिसंचरण में अधिक मात्रा में रक्त को धकेल देती है। इस प्रकार जब-जब शरीर को आॅक्सीजन की आवश्यकता पड़ती है, करोड़ों लाल रक्त-कण जो पूरी तरह से आॅक्सीजन से भरे रहते हैं, उसके सहायतार्थ पहुंच जाते हैं।
उत्सर्जन तंत्र ;म्ग्ब्त्म्ज्व्त्ल् ैल्ैज्म्डद्ध
शारीरिक व मानसिक क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर के उळतकों की कुछ कोशिकाओं में सदैव टूट-फूट होती रहती है। शरीर में नियन्त्रित व्यवस्थानुसार उसकी मरम्मत निरन्तर होती रहती है। भोजन से शक्ति एवं गर्मी मिलती है, जिससे ये क्रियाएं संभव होती है। भोजन के मंद दोहन तथा कोशिकाओं के विनाश से शरीर में कई प्रकार के विकार उत्पन्न होते रहते हैं। इन विकारों का शरीर में देर तक रहना हानिप्रद सि( हो सकता है, अतः इसी इसी शरीर में कुछ अंग ऐसे भी हैं, जो इन विषैले विकारों को शरीर से सदैव निष्कासित करते रहते हैं। शरीर के विकार कुछ ठोस, द्रव और कुछ गैसों के रूप में रहते हैं। विकारों का उत्सर्जन करने वाले अंग-वृक्क, त्वचा और फुप्फुस आदि है। इनमें निकृष्ट पदार्थों के उत्सर्जन की दृष्टि से वृक्क सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है।
प्रमुख अंग-वृक्क ;ज्ञपकदमलद्ध, मूत्र नलिका ;न्तमजमतद्ध, मूत्राशय ;न्तपदंतल इसंककमतद्ध, मूत्र मार्ग ;न्तमजीतंद्ध,
प्रमुख कार्य-रक्त शु(िकरण का कार्य करता है।
रक्त जब घूमता हुआ वृक्क में पहुंचता है तो अनावश्यक तत्व नमक, अतिरिक्त जल आदि जिसे मूत्र कहते हैं उसको मूत्राशय में भेज देता है। मूत्राशय से मूत्र प्रणाली द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है।
हमारे शरीर में दो वृक्क होते हैं जिनसे 10 से 12 इंच लम्बी दो नलिकाएं निकलती हैं जिसका एक सिरा वृक्क से तथा दूसरा सिरा मूत्राशय से जुड़ा रहता है। जिसे मूत्र नलिका कहते हैं। हर वृक्क में लगभग 10 लाख छोटे-छोटे छन्ने होते हैं। दोनों वृक्कों में लगभग 20 लाख छन्ने दिन रात रक्त के शु(िकरण में लगे रहते हैं। इसके द्वारा दिन में लगभग 1.5 लीटर पानी, 30 ग्राम यूरिया व 300 ग्राम अन्य तत्वों को बाहर निकाला जाता है।
नाड़ी ;स्नायुद्ध संस्थान ;छम्त्टव्न्ै ैल्ैज्म्डद्ध
किसी मशीन को उचित ढंग से चलाने के लिए एक संचालक की आवश्यकता होती है। किसी बड़े कारखाने में या कार्यालय में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग विभाग होते हैं, परन्तु सभी विभागों की देख-रेख एवं सामंजस्य के लिए एक महाप्रबंधक होता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य के शरीर में विभिन्न कार्यों के संचालन के लिए एक संचालक होता है। यह संचालक तंत्रिका संस्थान है। शरीर रूपी जटिल यंत्र के विभिन्न यंत्रों के कार्य में सामंजस्य उत्पन्न करने के लिए शरीर के अंतर्गत यह विशेष तंत्र रहता है। शरीर के सभी कार्यों यथा चलने-फिरने, देखने, भोजन करने आदि के लिए कुछ विशेष प्रकार के अंग होते हैं। इन सभी अंगों से सम्बन्धित शरीर में पतले धागों का एक जाल-सा फैला रहता है। इन धागों को तंत्रिका और इनसे बने जाल को स्नायु तंत्र कहते हैं। ये सब तंत्रिकाएं आपस में मिलकर एक मोटी तंत्रिका बनाती है जो मस्तिष्क से जुड़ी रहती है। यह शरीर के प्रत्येक कार्य को समन्वित तथा संपूर्ण शरीर पर शासन करता है। इसके अभाव में शरीर के सभी अवयव निष्क्रिय हो जाते हैं। शरीर के सभी ऐच्छिक एवं अनैच्छिक कार्यों पर नियंत्रण तथा समस्त संवेदनाओं को ग्रहण कर मस्तिष्क में पहुंचाना इसी तंत्र का कार्य है। तंत्रिका-कार्य केवल स्मृति, विवेक और ज्ञान तक ही सीमित नहीं है। बल्कि यह वह निर्देशक बल है, जो शरीर के सभी अंगों के आंतरिक एवं बाह्य जगत के प्रभावों के प्रति सक्रिय रहता है। बाह्य जगत के निरंतर भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तनों का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। जिसकी शरीर पर कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य होती है। हमारे पैर में कांटा चुभने से पैर की त्वचा में स्थित कोशिकाओं के जीव-द्रव में हलचल मचती है, जिसकी सूचना विशेष तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क तक पहुंचती है। सूचना पाते ही मस्तिष्क की कोशिकाओं में हलचल मच जाती है। जिससे उत्पन्न उत्तेजना पुनः पैर की पेशियों में पहुंचती है। तब पेशियों में कुछ परिवर्तन होता है और पैर स्वयं उस स्थान से हट जाता है। इस प्रकार बाहरी वातावरण का प्रभाव मनुष्य की किसी स्थानीय कोशिका में सीमित नहीं रहता है बल्कि उसकी शारीरिक क्रियाओं पर पड़ता है।
तंत्रिका
तंत्रिका तंत्र तथा उसके भिन्न-भिन्न भागों में जो कार्य होते हैं, वे वास्तव में वहां की तंत्रिका कोशिकाओं के ही कार्य हैं। जिस तरह यकृत सरीखा अंग असंख्य छोटी-छोटी इकाइयांे या यकृत कोशिकाओं का बना होता है उसी तरह तंत्रिका कोशिका नामक इकाइयांे का बना होता है। कार्य तथा गुणों के आधार पर तंत्रिका तंत्र के दो मुख्य भाग होते हैं।
ऐच्छिक तंत्रिका ;टवसनदजंतल छमतअमेद्ध तंत्र
इस भाग के सभी तंत्रिका तंतु ऐच्छिक पेशियों में जाते हैं। इन तंतुओं से कई प्रकार की संवेदनाएं मस्तिष्क को पहुंचती है। यह भाग मस्तिष्क, सुषुम्ना और उनसे निकलने वाली अनेक तंत्रिकाओं द्वारा गठित है। यह तंत्रिका तंत्र हमारी इच्छा के अधीन रहता है। इसलिए इसे ऐच्छिक तंत्रिका तंत्र या केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र कहते हैं। इसी तंत्र की सहायता से हम विभिन्न प्रकार की संवेदनाएं ग्रहण करते हैं, तथा स्वयं को बाह्य जगत के वातावरण के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं तथा अपनी इच्छानुसार हाथ-पैर चलाते हैं और सोच समझ कर कुछ कार्य करते हैं।
अनैच्छिक ;प्दअवसनदजंतलद्ध तंत्रिका तंत्र
इस भाग के तंत्रिका तंतु अनैच्छिक पेशियों जैसे फेफड़ा, मूत्राशय, गर्भाशय, अमाशय तथा शरीर के विभिन्न ग्रंथियों में जाते हैं। जिनकी गति पर हमारा कुछ भी अधिकार नहीं रहता। इनकी तंत्रिकाओं द्वारा आंतरिक अंगों से संवदेनाएं मस्तिष्क में पहुंचती रहती हैं। इनकी क्रिया स्वतः हुआ करती है इसलिए इसे अनैच्छिक या स्वचालित ;।नजवदवउपबद्ध तंत्रिका तंत्र कहा जाता है।
संवेदी तंत्रिका ;।ििमतमदजध्ैमदबमतल दमतअमेद्ध
तंत्रिकाएं जो संवेदना शरीर के अन्य भाग से या बाह्य सतह से ग्रहण कर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में पहुंचाती है, उन्हें संवेदी तंत्रिका कहते हैं।
प्रेरक तंत्रिका ;म्ििमतमदजध्डवजवत दमतअमेद्ध
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र से पेशियों तक जैसे-किसी अंग अथवा उळतक तक आवेग ले जाने वाली तंत्रिका प्रेरक तंत्रिका कहलाती है।
शरीर रचना विज्ञान के अनुसार दो विभाग
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र ;ब्मदजतंस छमतअमे ैलेजमउद्ध
मस्तिष्क व मेरूरज्जु से बना है।
पेरीफेरल तंत्रिका तन्त्र ;चमतपचीमतंस छमतअमे ैलेजमउद्ध
12 जोड़ी कपाल तंत्रिकाओं ;ब्तंदपंस छमतअमेद्ध व 31 जोड़ी मेरू तंत्रिकाओं से बना होता है।
प्रजनन संस्थान ;त्मचतवकनबजपअम ैलेजमउद्ध
उच्च कोटि के जीवों में जिनमें मनुष्य भी शामिल है, लिंग अलग होते है और परिणामतः जनन के लिए लैंगिक सहवास अनिवार्य है। पुरुष तथा स्त्री के शरीर में प्रजनन कार्य के लिए कुछ विशेष अंग होते हैं। उसे प्रजनन तन्त्र कहते हैं। जनन अंग पुरुष और स्त्रियों में भिन्न होते हैं।
पुरुष-प्रमुख अंग-वृषण ;ज्मेजमेद्ध, शुक्रवाहिका ;टंे क्ममितमदेद्ध, शुक्राशय ;ैमउपदंस टमेपबसमद्ध, पुरःस्थ ;च्तवेजंजमद्ध, शिशन ;च्मदपेद्ध
वृषण नर जनन ग्रंथियां हैं जो शरीर के बाहर वृषण कोष में स्थित है। जो संख्या में दो और अंडाकार होती है। एक वृषण में नौ या दस तिकोनी कोठरियां सी होती है, प्रत्येक प्रत्येक कोठरी सूक्ष्म नलिकाओं के गुच्छे के समान होती है। जिसे शुक्र जनक नलिकाएं कहते हैं। सारी गं्रथि में लगभग 1000 नलिकाएं हैं। ये नलिकाएं गुच्छे के रूप में लिपटी होने के कारण थोड़े स्थान में व्यवस्थित रहती है। प्रत्येक कोष्ठ की नलिकाएं ग्रंथि के पिछले भाग में मिल जाती है फिर सभी आपस में मिलकर दो या तीन बड़े आकार की अत्यंत लिपटी हुई नलियों की एक श्रृंखला बना देती है और अंत में अधिवृषण वाहिनी बनाती है। यह एक 6 मीटर लंबी नली है, जो वृषण के पिछले भाग में लिपटी-सी रहती है। अधिवृषण का एक छोर वृषण में रहता है। और दूसरा छोर आगे चल कर शुक्रवाहिनी नलिका बनाती है। दोनों ओर की शुक्रवाहिनी नलिकाएं उदर गुहा में होती हुई मूत्र-मार्ग के कुछ पास दो छोटी छोटी थैलियांे में मिलती हैं, जिन्हें शुक्राशय कहते हैं। शुक्राशयों से दो छोटी तथा पतली नलियां मूत्र-मार्ग में मूत्राशय के कुछ नीचे खुलती है, जिन्हें स्खलनीय नलिकाएं कहते हैं। इन्हीं नलिकाओं के माध्यम से शुक्र मूत्रमार्ग से होकर बाहर निकलता है। पुरःस्थ ग्रंथियों के नीचे और मूत्रमार्ग के दोनों ओर एक-एक मटर के समान दो छोटी-छोटी गं्रथियां होती हैं जिन्हें कूपर ग्रंथि कहते हैं। शुक्राणुओं का निर्माण अण्डकोश में होता है। जहां से मैथुन क्रिया के समय लिंग के माध्यम से स्त्री के योनी में प्रवेश करते हैं व स्त्रियों के डिम्ब गं्रथि से निकलने वाले डिम्ब डिम्बवाहिनी नली से होता हुआ गर्भाशय में पहुंचता है। जहां पर दोनों का निषेचन होता है व नये संतान का जन्म होता है। एक बार की मैथुन क्रिया में लगभग 20 से 30 लाख शुक्र कीट विसर्जित होते हैं। साथ ही इसमें शुगर, केल्सियम, साइटेªट आदि भी होते हैं। जो डिम्ब को फोड़ने में सहायता कर निषेचन की क्रिया को पूर्ण करते हैं।
महिला जननांग
प्रमुख अंग- योनि ;टंहपदंद्ध, गर्भाशय ;न्जमतनेद्ध, डिम्बवाहिनी नली ;थ्ंससवचंपद ज्नइमद्ध डिम्ब गं्रथि ;अंतपमेद्ध
योनि एक पेशीय नली है, बाहरी तल से गर्भाशय तक रहती है। यह गर्भाशय तथा प्रजनन अंग के बाह्य भाग के मध्य परिवहन के रूप में काम करती है। यह स्त्री का ग्रहणशील लैंगिक अंग है तथा प्रजनन का मार्ग है। पुरुष के समान स्त्री में दो डिम्ब ग्रंथियां बादाम के आकार की भूरे रंग की होती है। ये गर्भाशय से चैड़े स्नायु द्वारा जुड़ी रहती है। इनमें तन्तुओं से निर्मित अनेक अण्डकोष होते हैं। इसका मुख्य कार्य अण्डाणु को विकसित करना व स्त्री के अनेक शारीरिक कार्यों को अत्यधिक प्रभावित करने वाले स्त्राव को उत्पन्न करना है। डिम्ब ग्रंथियों में अपरिपक्व अंडाणु अधिक संख्या में रहते हैं। जिसे प्राथमिक डिम्ब कोशिका कहते हैं। अंडाणु ;व्अंद्ध चारों ओर से पोषक पुटक कोशिका गुच्छ ;थ्वससपबसम ब्मससेद्ध के रूप में घिरे रहते हैं। इन कोशिकाओं को आदि पुटक ;च्तमउवतकपंस थ्वससपबसमेद्ध कहते हैं।
बचपन में कन्या शिशु की प्रत्येक डिम्ब गं्रथि में हजारों डिम्ब रहते हैं। जिनमें से औसतन चार-पांच सौ ही परिपक्व हो पाते हैं। साधारणतः इसकी बनावट डिम्बगं्रथि में बाह्य स्तर में बीज उपकला ;ळमतउपदंस म्चपजीमसपनउ द्ध की रहती है। जिसमें डिम्ब पुटक ;ळतंतपंद थ्वससपबसमद्ध का परिवर्धन होता है। कोशिकाओं के समूह के बीच की मध्यस्थ कोशिका ही डिम्ब बनाती है। कोष के भीतर द्रव बनने से मध्यसथ कोशिका अपने संपर्क की कोशिकाओं के साथ बाहरी भाग से अलग हो जाती है। दोनों के बीच अंतर बढ़ जाता है, जिनमें द्रव भर जाता है। जिसे पुटक द्रव ;स्पुनवत थ्वससपबनसपद्ध कहते हैं। द्रव की मात्रा बढ़ती जाती है। जिससे कोष का आकार बढ़ता जाता है। और वह ग्रंथि की सतह की ओर चलने लगता है। डिम्ब पुटक धीरे-धीरे परिपक्व हो जाता है और उसके पृष्ठक पर एक उभार दिखाई पड़ने लगता है। आदि पुटक की कोशिकाएं लगभग 10-14 दिनों में परिपक्व हो जाती हैं। डिम्ब ग्रंथि के बाह्य भ्